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The adoption of the 2030 Sustainable Development Agenda, with its core set of 17 Sustainable Development Goals (SDGs), are the UN’s blueprint for achieving a happier and healthier world by 2030. But how do we all manifest these goals in our own lives? The Be the Change Initiative provides an opportunity for all of us to better “walk the talk” when it comes to the SDGs. This initiative guides and encourages us to live more sustainable in work and at home by changing our consumption patterns, using active transport such as cycling, and buying local foods.

News & Analysis

जलवायु वार्ता में पानी का मुद्दा बहुधा हाशिए पर रहा है

थालिफ़ दीन


संयुक्त राष्ट्र (आईपीएस) - हाल ही में, अमेरिका के विदेश मंत्री जॉन केरी ने विश्व भर में ख़राब मौसम से संबंधित घटनाओं की संख्या में "रिकॉर्ड बढ़ौतरी" के बारे में ज़िक्र छेड़ कर सबका ध्यान इस ओर आकर्षित किया है।

पेरिस में आयोजित होने वाली जलवायु परिवर्तन वार्ता को ध्यान में रखते हुए उन्होंने चेतावनी दी है कि प्रशांत महासागर के दक्षिणी भाग में स्थित द्वीपों के अस्तित्व पर ख़तरा मंडरा रहा है और इसका प्रमुख कारण समुद्र के जलस्तर में बढ़ौतरी है।

दक्षिण-पूर्व ब्राजील में, लोग विगत 80 वर्ष के सबसे ख़राब सूखे से जूझ रहे हैं। कैलिफोर्निया सदी के सबसे भीषण सूखे का सामना कर रहा है और साथ ही दावानल (जंगल की आग) से भी त्रस्त है।

मलावी में, बाढ़ कीर्तिमान बना रही है। केरी 15 अक्टूबर को इंडिआना विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ़ ग्लोबल एंड इंटरनेशनल स्टडीज़ में बोल रहे थे। उन्होंने आगे कहा कि आर्कटिक में, पूरे के पूरे गांव खतरे में हैं।

केरी की चेतावनी के बावजूद, पेरिस वार्ता की तैयारी को देखते हुए पानी का मुद्दा तुलनात्मक रूप से उपेक्षित ही नज़र आ रहा है जबकि कार्बन उत्सर्जन ध्यान का केंद्र बना हुआ है।

पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने की आवश्यकता पर जोर देते हुए यूनाइटेड किंगडम स्थित गैर सरकारी संगठन वाटरऐड में जल सुरक्षा और जलवायु परिवर्तन पर वरिष्ठ नीति विश्लेषक लुई विटलिंग ने आईपीएस को बताया कि दुनिया के सबसे ग़रीब लोग जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हैं। यह जलवायु परिवर्तन मुख्यतः पानी के माध्यम से होता है, जैसे बहुत अधिक पानी (बाढ़ और समुद्र के जल स्तर में बढ़ौतरी), बहुत कम पानी (सूखा), गलत समय पर पानी (मौसम के अप्रत्याशित मिजाज के कारण) या ख़राब पानी (बहुत नमकीन या प्रदूषित)।

65 करोड़ से अधिक हाशिए पर पड़े ग़रीब लोग जल के असुरक्षित स्रोतों पर निर्भर हैं। इन जल स्रोतों पर जलवायु संबंधित ख़तरा मंडराने से इन लोगों का अस्तित्व भी ख़तरे में है।

उदाहरण के लिए विटलिंग ने बताया, बाढ़ नलकूपों को जलमग्न कर सकती है और ताजा पानी के प्राकृतिक स्रोत नमकीन समुद्री जल से दूषित हो सकते हैं।

30 नवंबर से 11 दिसंबर तक पेरिस में आयोजित होने वाली संयुक्त राष्ट्र की इस वर्ष की जलवायु वार्ता से पहले जल सुरक्षा के लिए वाटरऐड अंतरराष्ट्रीय समुदाय का आह्वान कर रहा है। जब ग़रीब देशों की इस जलवायु परिवर्तन से सामंजस्य बिठाने में सहायता की बात हो तो जल की उपलब्धता, सवच्छता और स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।

विटलिंग के अनुसार, पर्याप्त पानी, साफ-सफाई और स्वच्छता सुविधाएं लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक स्थिरता में सुधार लाती हैं और उन्हें जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अधिक सक्षम बनाती हैं। "हमें यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि इन प्रयासों के लिए पैसा उन लोगों से प्राप्त हो जिनके कारण यह समस्या उत्पन्न हुई और उन लोगों तक पहुंचे जो इससे निपटने में सबसे कम सक्षम हैं।

2010 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पर वोट किया था जिसने पानी और स्वच्छता को मानव अधिकार के रूप में मान्यता दी गई थी।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की मून कई बार कह चुके हैं कि ग़रीबी उन्मूलन, सतत विकास, और सहस्त्राब्दि के किसी भी विकास के लक्ष्य को पूरा करने के लिए सुरक्षित पेयजल और पर्याप्त सफाई बहुत महत्वपूर्ण है। इन लक्ष्यों की समय सीमा दिसंबर में समाप्त हो रही है।

लेकिन 25 सितंबर को दुनिया के नेताओं द्वारा अपनाए गए 17 नए सतत विकास लक्ष्य (SDGs) भी पानी और स्वच्छता को संयुक्त राष्ट्र के 2015 पश्चात के विकास के एजेंडे के महत्वपूर्ण मुद्दे मानते हैं।

2030 तक, संयुक्त राष्ट्र न्यायसंगत तरीके से सुरक्षित और सस्ता पीने योग्य पानी सब लोगों की पहुँच में लाने के लिए आशावान है। इसके साथ ही प्रदूषण घटा कर, कचरे और ख़तरनाक रसायनों को पानी में मिलने से रोक कर, संयुक्त राष्ट्र का प्रयास पानी की गुणवत्ता में सुधार लाना है। संयुक्त राष्ट्र का लक्ष्य यह भी है कि जल का प्रयोग हर क्षेत्र में कुशलता से हो और पानी की कमी से निपटने के लिए जल का दोहन और आपूर्ति इस प्रकार हो कि जल स्रोत चिरस्थायी बने रहें।

विटलिंग ने आईपीएस को बताया कि वाटरऐड का ध्यान ग़रीब समुदायों तक अच्छा पानी पहुँचाने और उनके लिए समुचित शौचालय की व्यवस्था करने पर केंद्रित रहेगा।

"हम पानी की भंडारण क्षमता बढ़ाने के लिए काम करते हैं और पानी की आपूर्ति की निगरानी को बेहतर बनाते हैं जिससे कि सूखे का पता जल्दी लगाया जा सके। बांग्लादेश जैसे देशों में, जहाँ बाढ़ की समस्या है, वहाँ हम जहाँ आवश्यक हो बुनियादी ढांचे को और अधिक मजबूत बनाते हैं, और समुदायों को एकजुट कर के उन्हें जोखिम के आकलन में सहायता करते हैं जिससे कि वे अपनी सरकारों से बेहतर सेवाओं की मांग कर सकें।"

वाटरऐड पश्चिम अफ्रीका में भी 29 समुदायों की पानी की कमी से निपटने में मदद कर रहा है और उन्हें जलवायु परिवर्तन के ख़तरों से निपटने के लिए अधिक सक्षम बना रहा है। इसके लिए वाटरऐड उन लोगों की उनके जल के स्रोतों का बेहतर प्रबंधन करने में सहायता कर रहा है।

बुर्किना फ़ासो में, जहाँ वर्ष में आठ महीने शुष्क मौसम रहता है, कई समुदायों का जीवन बड़ा जोखिम भरा होता है। जलवायु परिवर्तन उनकी स्थिति को और अधिक ख़राब करता है।

वाटरऐड पानी के लिए किये गए गड्ढों (बोरहोल), रेत के बाँध और मौजूदा कुओं में सुधार के साथ-साथ स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित कर के उन्हें जल विशेषज्ञ भी बना रहा है।

विटलिंग ने बताया कि ये विशेषज्ञ जल-स्तर माप कर, वर्षा के पानी पर नज़र रख कर, जोखिम का पूर्वानुमान लगा कर और उभरते डेटा पैटर्न को देख कर, समुदाय द्वारा अपनी जल आपूर्ति के नियंत्रण में क्रन्तिकारी बदलाव ला रहे हैं। इससे उन्हें यह तय करने में सुविधा हो रही है कि उहें कौन सा पानी, दिन के किस समय और कितनी मात्रा में प्रयोग करना है।

ये जल विशेषज्ञ एकत्रित डेटा को सरकार की निगरानी योजनाओं के लिए भी उपलब्ध करवाते हैं जिससे देश भर में जलवायु पैटर्न की एक समग्र तस्वीर उभर कर आती है।

विटलिंग ने कहा, "प्रकृति इस बात की परवाह नहीं करती कि आप बुर्किना फासो में ग़रीबी में निर्वाह करने वाले एक किसान हैं या कैलिफोर्निया में एक एकाउंटेंट हैं।"

"जलवायु परिवर्तन हम सभी को प्रभावित करेगा। परन्तु, यह सबसे अधिक उन्हें प्रभावित करेगा जो इस समस्या के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं।"

उन्होंने कहा कि पेरिस में जमा होने वाले विश्व के नेताओं को ग़रीब देशों को तकनीकी और वित्तीय सहायता उपलब्ध करवाने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए जिससे कि वे आने वाले बदलाव के अनुरूप ढल सकें।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार 1990 के बाद से करीब 2.6 अरब लोगों के पेयजल के स्रोतों में सुधार हुआ है। लेकिन, 66 करोड़ से अधिक अभी भी इस दायरे से बाहर हैं जबकि विश्व भर में 1.8 अरब लोग मलीय पानी पीने को मजबूर हैं।

1990 और 2015 के बीच, पीने के पानी का बेहतर स्रोत उपयोग करने वाली वैश्विक जनसँख्या का प्रतिशत 76 से बढ़ कर 91 हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र इस ओर भी ध्यान दिलाता है कि पानी की कमी 40 प्रतिशत से अधिक वैश्विक आबादी को प्रभावित करती है और अनुमानों के अनुसार यह प्रतिशत और बढ़ने वाला है। (20 अक्टूबर 2015)

यह लेख आईपीएस उत्तरी अमेरिका, वैश्विक सहयोग परिषद और देवनेट टोक्यो की संयुक्त मीडिया परियोजना का हिस्सा है।

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