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Be the Change Initiative

The adoption of the 2030 Sustainable Development Agenda, with its core set of 17 Sustainable Development Goals (SDGs), are the UN’s blueprint for achieving a happier and healthier world by 2030. But how do we all manifest these goals in our own lives? The Be the Change Initiative provides an opportunity for all of us to better “walk the talk” when it comes to the SDGs. This initiative guides and encourages us to live more sustainable in work and at home by changing our consumption patterns, using active transport such as cycling, and buying local foods.

News & Analysis

स्थायी ग़रीबी से निकलने का व्यवहारिक तरीका

प्रो। काज़ुओ ताकाहाशी* द्वारा

टोक्यो (आईडीएन) - 1970 के दशक के बाद से ग़रीबी उन्मूलन विकास सहयोग के एजेंडे में रहा है: रॉबर्ट मैक नमारा ने 1973 में घोषणा की थी कि विश्व बैंक का मिशन है वर्ष 2000 तक गरीबी को समाप्त करना, और तीन वर्ष बाद विकास सहायता समिति (डीएसी), जिसमें विश्व के प्रमुख दानदाता शामिल थे, ने मूलभूत आवश्यकता दृष्टिकोण को अपनाया। लेकिन विकास के लिए काम कर रहे इन लोगों के लिए बड़ी चुनौती ग़रीबों और वंचितों को पर्याप्त राहत प्रदान करने का एक प्रभावी तरीका खोजना रही है।

कुछ समय तक इस मुद्दे को वैचारिक माना जाता था - विकास और वितरण के बीच एक विकल्प। वैचारिक दृष्टिकोण से नीतिगत ढांचा स्थापित करने का अंतिम प्रयास था डीएसी का 1996 का घोषणा पत्र: 21वीं सदी की योजना; विकास सहयोग का योगदान

ग़रीबी उन्मूलन पर ध्यान केंद्रित करते हुए, यह नीति शीत युद्ध की समाप्ति के शीघ्र बाद के औद्योगिक देशों के मौजूदा राजनीतिक माहौल को ध्यान में रख कर बनाई गई थी। 1990 के दशक में, तथाकथित तीसरे मार्ग की पक्षधर सामाजिक प्रजातान्त्रिक पार्टियां, जो यूरोपीय संघ के 15 सदस्य देशों में से 10 से अधिक देशों में शासन कर रही थीं, मुक्त-बाज़ार पूँजीवाद और समाजवाद के बीच मध्य मार्ग तलाश रही थीं।

संयुक्त राज्य अमेरिका में बिल क्लिंटन की वामपंथी डेमोक्रेटिक पार्टी राष्ट्रपति पद के लिए यूरोप में तीसरे मार्ग की पार्टियों के वार्षिक महासम्मेलनों में भाग ले रही थी। जापान, जो आधिकारिक विकास सहायता (ओडीए) का एक शीर्ष दाता था, पर उस समय एक गठबंधन सरकार का शासन था जिसकी अध्यक्षता समाजवादी प्रधानमंत्री टोमिची मुरायामा कर रहे थे।

ओडीए समुदाय की कोशिश थी कि वे अपनी नीति को मौजूदा राजनीतिक प्रवृत्ति के यथासंभव अनुरूप बनाए रखें और प्रत्येक देश के बजट में अपना हिस्सा प्राप्त करें। हालांकि, दशक के अंत से पहले, व्यावहारिक रूप से सभी प्रमुख औद्योगिक देशों में राजनीतिक माहौल रूढ़िवादी हो गया, और इस प्रकार डीएसी नीति अप्रासंगिक हो गई।

डीएसी का घोषणा पत्र संयुक्त राष्ट्र को दिया गया जिसे वर्ष 2000 में शिखर सम्मेलन में सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों (एमडीजी) पर एक घोषणा के मसौदे को अपनाना था। हालांकि, एमडीजी प्रारंभ से ही डीएसी घोषणा की एक बदक़िस्मत कार्बन कॉपी थी।

हालांकि, 2001 के 9/11 के सिलसिलेवार आतंकवादी हमलों - जिनमें न्यूयॉर्क में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमले शामिल हैं - ने अचानक विकास सहयोग के लिए औद्योगिक देशों की रूढ़िवादी सरकारों की राजनीतिक प्रतिक्रिया को बदल दिया।

उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मूल कारण ग़रीबी है। इसलिए, यह महत्वपूर्ण है कि विकास सहयोग के ध्यान का केंद्र ग़रीबी उन्मूलन हो। 2002 में एमडीजी को रूढ़िवादी सरकारों ने भी आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का महत्वपूर्ण हथियार माना। तब से, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़रीबी उन्मूलन को एक वैचारिक मुद्दे से बढ़ कर एक व्यापक आधार नीति उद्देश्य के रूप में स्वीकार कर लिया गया है।

विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय समिति द्वारा ग़रीबी की समस्या को व्यवहारिक तौर पर कम करने और यदि संभव हो तो समाप्त करने के लिए कई प्रयास किये गए हैं। देवनेट जापान ऐतिहासिक सन्दर्भ में इस मुद्दे पर अपने दृष्टिकोण का खुलासा कर रहा है।

देवनेट जापान की सोच यह है कि विकास की दृष्टि से सबसे पिछड़े देशों के ग़रीब किन्तु संभावित प्रतिभावान युवाओं को औद्योगिक रूप से विकसित देशों में उपलब्ध तकनीकी जानकारी से परिचित करवाया जाए और शैक्षिक और वित्तीय मूल्य दिए जाएं जिससे कि वे अपने देश को सतत विकास की राह पर अग्रसर कर सकें।

देवनेट जापान इस दिशा में ठोस कार्यवाही के लिए पहले लाओ पीडीआर पर ध्यान केंद्रित करेगा। लाओशिया युवाओं का चयन करेगा जिन्हें उनके ही देश इस तरह प्रशिक्षित किया जाएगा कि वे जापान की परिस्थितियों में ढल जाएं।

देवनेट जापान, जिसे जापान के एक बड़े हिस्से में स्थानीय कंपनियों और फार्मों के साथ काम करने के लिए अधिकृत किया गया है, इन युवाओं को आगे का प्रशिक्षण देगा जिससे कि वे स्थानीय कंपनियों या फार्मों में प्रशिक्षण पाने की अर्हता प्राप्त कर लें। देवनेट जापान उनमें से हर एक के प्रशिक्षणार्थी के लिए उचित प्रशिक्षण केंद्र तलाशेगा।

देवनेट जापान यह सुनिश्चित करगा कि प्रशिक्षु कौशल और तकनीकी जानकारी के अतिरिक्त कुछ वित्तीय आधार भी पाएं जो उन्हें लाओ पीडीआर में व्यवस्था बनाने में सहयोग करेगा जिससे वे उपयुक्त कंपनियों या फार्मों में नियुक्त किये जा सकें या नया व्यापार शुरू कर सकें।

इस योजना का खर्च सारे साझेदार मिल कर वहन करेंगे ताकि यह योजना आत्मनिर्भर बन सके। देवनेट जापान इस योजना को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक घटक विकसित कर रहा है और उसे विश्वास है कि यह योजना आने वाले समय में क्रियान्वित हो जाएगी। इस प्रणाली में एक मूल्यांकन तंत्र भी जोड़ा जाएगा ताकि इसमें निरंतर सुधार किया जा सके।

यह तंत्र अन्य देशों भी लागू किया जाएगा। समय के साथ, इस तरह के दृष्टिकोण की पहचान वैचारिक युग के बाद ग़रीबी उन्मूलन के लिए देवनेट दृष्टिकोण के रूप में होगी जो कि सबसे व्यवहारिक प्रयास के रूप में देखा जाएगा। सबसे कठिन वैश्विक मुद्दों से निपटने के लिए नागरिक समाज और व्यापार के बीच एक समामेलन – जहाँ सार्वजनिक क्षेत्र (राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय) एक अनुपूरक भूमिका निभाएगा – 21 वीं सदी के प्रकार के अंतरराष्ट्रीय विकास सहयोग के लिए मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

* प्रो काज़ुओ ताकाहाशी जो देवनेट जापान के बोर्ड के सदस्य हैं, पेरिस में ओईसीडी के मुख्यालय में एक पूर्व अर्थशास्त्री, एफएएसआईडी-फाउंडेशन फॉर एडवांस्ड स्टडीज़ ऑन इंटरनेशनल डेवलपमेंट के निदेशक, संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय के विजिटिंग प्रोफेसर, टोक्यो विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर, अंतर्राष्ट्रीय ईसाई विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और संयुक्त राष्ट्र अध्ययन के लिए जेएयूएनएस-जापान एसोसिएशन फॉर यूनाइटेड नेशंस स्टडीज़ के बोर्ड मेंबर हैं। (11 जनवरी 2016)

यह लेख वैश्विक सहयोग परिषद और DEVNET जापान के साथ संयुक्त रूप से आईडीएन की मीडिया परियोजना का हिस्सा है।

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